Moovie Review, Moovies Review
Sunday, August 19, 2012
एक था टाइगर
महीने भर चला हॉट और बोल्ड फिल्मों का सीजन 'एक था टाइगर' के साथ इस हफ्ते खत्म हुआ। इस वीक बॉक्स ऑफिस पर ऐसी फिल्म ने दस्तक दी, जिसे आप बेहिचक फैमिली के साथ देख सकते हैं। सलमान ने अपने लंबे करियर में पहली बार यशराज बैनर की फिल्म की है। पहली बार कोई हिंदी फिल्म दिल्ली-यूपी के पौने तीन सौ स्क्रीन पर रिलीज हुई। पहली बार किसी फिल्म ने रिलीज से पहले देशभर में साढ़े पांच करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई सिर्फ एडवांस बुकिंग पर की।
सलमान की इस फिल्म की तुलना पिछली फिल्मों दबंग, रेडी और बॉडीगार्ड से नहीं की जा सकती। दरअसल, फिल्म के डायरेक्टर कबीर खान का फिल्म बनाने का नजरिया अलग है। कबीर की पिछली दोनों फिल्मों काबुल एक्सप्रेस और न्यू यॉर्क में फिल्म के स्टार्स किरदार पर हावी नहीं हुए। कबीर की इस फिल्म में सलमान ने भी अपनी पिछली मसाला फिल्मों में बनी इमेज से हटकर कुछ अलग इमेज बनाने की कोशिश की है।
कबीर ने फिल्म में दो पड़ोसी देशों (भारत-पाकिस्तान) की खुफिया एजेंसियों रॉ और आईएसआई के सीक्रेट एजेंट की कार्यशैली को असरदार ढंग से पेश करने के बजाय कहानी को लव स्टोरी में बदल दिया। करीब सवा दो घंटे की फिल्म में रॉ एजेंट टाइगर और आईएसआई एजेंट जोया की प्रेम कहानी को ज्यादा फुटेज दी गई। टाइगर और जोया की इस लव स्टोरी के बीच टाइगर का मिशन कहीं गुम होकर रह जाता है।
पाकिस्तान में फिल्म के कुछ डायलॉग पर उठे विवाद के बाद लगता है कि कबीर ने कहानी में आईएसआई से जुड़े कुछ डायलॉग को कट किया है। यशराज बैनर की यह पहली ऐसी फिल्म है, जो 50 करोड़ में बनी है। सलमान और कटरीना पर फिल्माए गए एक्शन सीन हॉलिवुड के बेहतरीन एक्शन डायरेक्टर की देखरेख में शूट हुए। वहीं, सलमान-कटरीना के लिए यह फिल्म बेहद खास है। इस जोड़ी की पिछली फिल्म युवराज बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थी।
अब जब बॉक्स ऑफिस पर सलमान-कैट टॉप पर हैं, ऐसे में इन्हें बॉक्स ऑफिस पर साबित करना होगा कि दर्शकों में इस जोड़ी का जबर्दस्त क्रेज है। इस्तानबुल, क्यूबा, लंदन कैपटाउन, टर्की की बेहतरीन लोकेशन, दमदार एक्शन, स्टंट सीन सलमान के फैंस को थिएटर तक खींचने का दम रखते हैं।
कहानी : डबलिन में भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के जांबाज ऑफिसर टाइगर (सलमान खान) को एक साइंटिस्ट (रोशन सेठ) पर नजर रखने के मिशन पर भेजा जाता है। इस मिशन में टाइगर के साथ गोपी (रणवीर शौरी) भी है। दरअसल, रॉ को शक है कि यह साइंटिस्ट मिसाइल से जुड़ी कुछ अहम जानकारियां दुश्मन मुल्क को दे रहा है। डबलिन रवाना होने से पहले टाइगर को उसका बॉस (गिरीश कर्नाड) किसी तरह के खून खराबे से बचने की नसीहत देता है।
इससे पहले टाइगर जिस मिशन पर गया, वहां से खून खराबा करने के बाद ही लौटा। इस मिशन में टाइगर की मुलाकात जोया (कटरीना कैफ) से होती है, जो उस वैज्ञानिक के घर की केयर टेकर है। टाइगर वैज्ञानिक तक पहुंचने के अपने मिशन में जोया की मदद लेता है। खैर, टाइगर अपने मकसद में कामयाब होता है और वैज्ञानिक के घर जा पहुंचता है। यहीं उसका ऐसी हकीकत से सामना होता है, जिसकी कल्पना उसने सपने में भी नहीं की थी।
ऐक्टिंग : रॉ एजेंट के रोल में सलमान प्रभावित करते हैं। वहीं, उनकी बदली हुई इमेज दर्शकों की उस क्लास को रास नहीं आएगी, जो सलमान की अपनी खास क्लास है। कटरीना कैफ ने पहली बार कई अच्छे एक्शन सीन किए हैं, लेकिन क्लोज अप सीन्स में कटरीना और सलमान की बढ़ती उम्र की झलक नजर आती है। रणवीर शौरी के लिए फिल्म में कुछ खास नहीं था। रोशन सेठ जैसे काबिल एक्टर को ऐसा छोटा सा रोल मिला, जिसमें उनके करने के लिए कुछ खास नहीं था। गिरीश कर्नाड बस ठीकठाक रहे।
संगीत : 'माशा अल्लाह' को छोड़कर फिल्म में ऐसा कोई गाना नहीं है, जो म्यूजिक लवर्स की कसौटी पर खरा उतर सके। कभी, यशराज की फिल्मों का म्यूजिक फिल्म का प्लस पॉइंट हुआ करता था, लेकिन पिछली कुछ फिल्मों का संगीत इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
क्यों देखें : बेहतरीन लोकेशन, ऐसे बेमिसाल एक्शन सीन जिनकी तुलना आप हॉलिवुड फिल्मों के एक्शन सीन के साथ कर सकते हैं। अतुल मिश्रा की बेहतरीन फोटोग्राफी इस फिल्म का प्लस पॉइंट है। वहीं, कमजोर स्क्रिप्ट के बीच जोया-टाइगर की ठंडी प्रेम कहानी सलमान के फैंस की कसौटी पर शायद खरी न उतर पाए।
Friday, February 4, 2011
127 Hours Moovie Review
मिलिनेअर से दुनिया भर में छाए डायरेक्टर डैनी बॉयल के फैंस को इंतजार था उनकी अगली फिल्म का। ऐसे में यकीनन डैनी के लिए भी अगली फिल्म का सब्जेक्ट चुनना कम चुनौती भरा काम नहीं था। दरअसल , बॉलिवुड और हॉलिवुड स्टार्स को लेकर बनी डैनी की पिछली फिल्म ने ऑस्कर में अपने नाम का डंका तो बजवाया ही था , लीक से हटकर कुछ अलग टेस्ट की फिल्मों के शौकीनों को भी डैनी की फिल्म ने बेहद प्रभावित किया।
पिछली फिल्म में डैनी ने ए . आर . रहमान का साथ लिया तो अपनी अगली फिल्म के लिए भी उन्हें रहमान के मुकाबले दूसरा कोई और नजर नहीं आया। अब जब एक बार फिर डैनी की इस फिल्म को ऑस्कर और बाफ्टा जैसे दुनिया के प्रतिष्ठित फिल्म अवॉर्ड की कैटिगरी में जगह मिली है और रहमान को डैनी की इस फिल्म के बेहतरीन ओरिजिनल म्यूजिक और इस फिल्म के गाने ' इफ आई राइज ' के लिए ऑस्कर की दो कैटिगरी में नामांकित किया गया है तो इस फिल्म का क्रेज यकीनन पहले से कहीं ज्यादा हो चुका है।
डैनी की इस फिल्म की कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित होने के साथ - साथ दर्शकों को किसी भी मुश्किल और विपरीत हालत में भी हार न मानने का संदेश देती है। यकीनन डैनी ने अपनी इस फिल्म की स्क्रिप्ट को फाइनल करने से पहले अपनी पिछली फिल्म को दुनिया भर में मिली तारीफ और अपने फैंस की उम्मीदों को भी दिमाग में रखा। डैनी पूरी तरह से खरे उतरे और करीब डेढ़ घंटे की इस फिल्म का एक फ्रेम भी ऐसा नहीं जो सिनेमा हॉल में बैठे दर्शक को पलक झपकने का मौका देता हो।
फिल्म के टाइटल से आप कहानी का अंदाज लगा सकते हैं। आसमां छूते दो पहाड़ों के बीच फंसे फिल्म के हीरो एरन ( जेम्स फ्रेंको ) के साथ लगभग पांच दिन पल - पल मौत को और नजदीक आते देख एरन की बेबसी और एरन के कभी न हार मानने वाले जज्बे को डैनी ने इस अंदाज में पेश किया है कि मौत के मुंह में फंसे नायक के साथ दर्शक आखिर तक बंध जाता है।
आसमां छूती दो चट्टानों से निकलते एरन पर ऊपर से गोलाकार चट्टान का हिस्सा गिरता है , एरन इससे खुद को बचाने में कामयाब होता है , लेकिन उसका एक हाथ इसमें ऐसा फंसता है कि जिसे किसी भी हालात में बाहर निकाल पाना नामुमकिन है। इन चट्टानों के बीच फंसे एरन के पास पानी की एक बोतल के अलावा अपना बैग और कैमरा है , जिससे एरन अपनी इस बेबसी को कैद करना शुरू करता है।
इन पांच दिनों में एरन को पता चल जाता है कि उसके पास किसी भी तरह की मदद पहुंचने के आसार नहीं। ऐसे में एरन ऐसा कठिन फैसला लेता है जो उसे एकबार जिंदगी के करीब लाता है। फिल्म की फोटोग्राफी का जवाब नहीं , ऊंची चट्टानों के बीच एरन की बेबसी और हर पल उसकी बढ़ती बेबसी को कैमरामैन ने बेहद खूबसूरती से अपने कैमरे में किया है।
पूरी फिल्म जेम्स फ्रेंको के इर्दगिर्द है , हां , डैनी ने दर्शकों को कहानी से बांधने के लिए फ्लैशबैक सीन्स को प्रभावी ढंग से कहानी का अहम हिस्सा बनाया है। फिल्म का क्लाइमैक्स कमजोर दिल वालों को एकबारगी झकझोर सकता है।
पिछली फिल्म में डैनी ने ए . आर . रहमान का साथ लिया तो अपनी अगली फिल्म के लिए भी उन्हें रहमान के मुकाबले दूसरा कोई और नजर नहीं आया। अब जब एक बार फिर डैनी की इस फिल्म को ऑस्कर और बाफ्टा जैसे दुनिया के प्रतिष्ठित फिल्म अवॉर्ड की कैटिगरी में जगह मिली है और रहमान को डैनी की इस फिल्म के बेहतरीन ओरिजिनल म्यूजिक और इस फिल्म के गाने ' इफ आई राइज ' के लिए ऑस्कर की दो कैटिगरी में नामांकित किया गया है तो इस फिल्म का क्रेज यकीनन पहले से कहीं ज्यादा हो चुका है।
डैनी की इस फिल्म की कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित होने के साथ - साथ दर्शकों को किसी भी मुश्किल और विपरीत हालत में भी हार न मानने का संदेश देती है। यकीनन डैनी ने अपनी इस फिल्म की स्क्रिप्ट को फाइनल करने से पहले अपनी पिछली फिल्म को दुनिया भर में मिली तारीफ और अपने फैंस की उम्मीदों को भी दिमाग में रखा। डैनी पूरी तरह से खरे उतरे और करीब डेढ़ घंटे की इस फिल्म का एक फ्रेम भी ऐसा नहीं जो सिनेमा हॉल में बैठे दर्शक को पलक झपकने का मौका देता हो।
फिल्म के टाइटल से आप कहानी का अंदाज लगा सकते हैं। आसमां छूते दो पहाड़ों के बीच फंसे फिल्म के हीरो एरन ( जेम्स फ्रेंको ) के साथ लगभग पांच दिन पल - पल मौत को और नजदीक आते देख एरन की बेबसी और एरन के कभी न हार मानने वाले जज्बे को डैनी ने इस अंदाज में पेश किया है कि मौत के मुंह में फंसे नायक के साथ दर्शक आखिर तक बंध जाता है।
आसमां छूती दो चट्टानों से निकलते एरन पर ऊपर से गोलाकार चट्टान का हिस्सा गिरता है , एरन इससे खुद को बचाने में कामयाब होता है , लेकिन उसका एक हाथ इसमें ऐसा फंसता है कि जिसे किसी भी हालात में बाहर निकाल पाना नामुमकिन है। इन चट्टानों के बीच फंसे एरन के पास पानी की एक बोतल के अलावा अपना बैग और कैमरा है , जिससे एरन अपनी इस बेबसी को कैद करना शुरू करता है।
इन पांच दिनों में एरन को पता चल जाता है कि उसके पास किसी भी तरह की मदद पहुंचने के आसार नहीं। ऐसे में एरन ऐसा कठिन फैसला लेता है जो उसे एकबार जिंदगी के करीब लाता है। फिल्म की फोटोग्राफी का जवाब नहीं , ऊंची चट्टानों के बीच एरन की बेबसी और हर पल उसकी बढ़ती बेबसी को कैमरामैन ने बेहद खूबसूरती से अपने कैमरे में किया है।
पूरी फिल्म जेम्स फ्रेंको के इर्दगिर्द है , हां , डैनी ने दर्शकों को कहानी से बांधने के लिए फ्लैशबैक सीन्स को प्रभावी ढंग से कहानी का अहम हिस्सा बनाया है। फिल्म का क्लाइमैक्स कमजोर दिल वालों को एकबारगी झकझोर सकता है।
Dil To Baccha Ji Hai Ji Moovie Review
बेशक डायरेक्टर मधुर भंडारकर का फिल्म बनाने का स्टाइल दूसरों से बिल्कुल अलग है। मधुर को ग्लैमर इंडस्ट्री के ज्यादातर नामी बैनर उन डायरेक्टर्स में शामिल करते हैं , जिनकी फिल्में एक खास क्लास के दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरती हैं। ऐसा लगता है ' चांदनी बार ' के बाद ' पेज थ्री ', ' सत्ता ', ' कॉरपोरेट ', ' फैशन ' और ' ट्रैफिक सिग्नल ' के बाद ' जेल ' से बनी अपनी इमेज को मधुर अब तोड़ने के मूड में हैं। मधुर ने लीक से हटकर बनाई अपनी पिछली फिल्मों से अलग इस फिल्म में कुछ नया और बिल्कुल अलग पेश करने की कोशिश की है। ऐसा लगता है कि मधुर ने अपनी तरफ से इस बार फुल एंटरटेनमेंट फिल्म बनाने की कोशिश की है। उनकी अपनी इमेज इस फिल्म पर कुछ हावी है , इसलिए उन्होंने फिल्म का सुखद अंत करने के बजाय फिल्म का एंड अपनी स्टाइल में पेश किया है।
कहानी : नरेन आहूजा ( अजय देवगन ) का अपनी जर्नलिस्ट वाइफ रितुपर्णा दास गुप्ता से तलाक हो चुका है। अपने बड़े बंगले के लोन की किस्त चुकाने के लिए वह अपने साथ अभय सूरी ( इमरान हाशमी ) और मिलिंद केलकर ( ओमी वैद्य ) को पेइंग गेस्ट रखता है। शौकीन मिजाज और ' सोओ और सोने दो ' को जिंदगी की टैग लाइन मानने वाला अभय सूरी जिम ट्रेनर है। झटपट शादी डॉट कॉम में मैनेजर मिलिंद केलकर सच्चे प्यार और लाइफ पार्टनर की तलाश में है। इनकी जिंदगी का नजरिया एक दूसरे से अलग है।
38 साल के नरेन आहूजा को अपने ऑफिस में बतौर ट्रेनी जॉइन करने वाली 20 साल की जून पिंटो ( शहजान पदमसी ) से प्यार हो जाता है। वहीं , अमीर लड़कियों को अपना एटीएम कार्ड समझने वाले अभय की जिंदगी में मिस इंडिया रह चुकी अनुष्का ( टिस्का चोपड़ा ) की एंट्री होती है , जो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा उम्र के अरबपति बिजनेसमैन नारंग की सेकंड वाइफ है। अनुष्का के रूप में अभय को अपना नया एटीएम कॉर्ड मिल जाता है। वहीं शादी को दो आत्माओं का अटूट बंधन समझने वाले मिलिंद कालेकर की मुलाकात रेडियो जॉकी गुनगुन सरकार ( श्रद्धा दास ) से होती है। कोलकाता से मुंबई आकर रेडियो जॉकी बनी गुनगुन एक्ट्रेस बनना चाहती है। गुनगुन की नजर में प्यार का कोई मतलब नहीं और वह मिलिंद को अपने मतलब के लिए यूज करने लगती है। इस बीच अभय सूरी की मुलाकात निक्की नारंग ( श्रुति हासन ) से होती है , अरबपति नारंग की बेटी निक्की को देखते अभय उससे प्यार करने लगता है। इस कहानी में कॉमिडी की चाशनी मिलाकर मधुर ने इसे अलग मसाला फिल्मों से हटकर परोसा गया है
एक्टिंग : नरेन आहूजा के रोल में अजय देवगन इस बार फिर ' अतिथि तुम कब जाओगे ' जैसे लुक में नजर आए। इमरान हाशमी सिल्वर स्क्रीन पर अपनी सीरियल किसर की इमेज से कितना बचना चाहे लेकिन मेकर्स उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे। हमेशा की तरह इमरान ने इस बार भी शौकीन मिजाज आशिक के रोल को ठीकठाक निभाया। सच्चे आशिक और भावुक कवि की भूमिका में ओमी वैद्य प्रभावित करते है , इस बार भी उनका हिंदी बोलने का स्टाइल ' थ्री इडियट्स ' में उनके रोल की याद दिलाता है। श्रद्धा दास , श्रुति हासन , शहनाज पद्मसी तीनों में से गुनगुन के किरदार में श्रद्धा दास नंबर वन है।
डायरेक्शन : इस बार भले ही मधुर ने अपनी रिएलिस्टिक डायरेक्टर की इमेज को कुछ चेंज करने की कोशिश की है। इस बार मधुर ने अपनी बात को कहने का अंदाज पिछली फिल्मों की तुलना में अलग चुना है। यह फिल्म उनकी गंभीर इमेज को बदलने में कुछ हद तक कामयाब होगी।
संगीत : प्रीतम का संगीत फिल्म का सशक्त पक्ष है , पिछले कुछ अर्से से हर दूसरी - तीसरी फिल्म में संगीत दे रहे बिजी प्रीतम ने इस बार कुछ नया और दिल को छूता संगीत दिया है। फिल्म की रिलीज से पहले फिल्म के तीन गाने ' अभी कुछ दिनों से , और ये दिल है नखरे वाला और तेरे बिन , जिया ... यंगस्टर्स की जुबां पर है।
क्यों देखे : अगर आप मधुर के फैंस है , तो इस फिल्म को देखिए। इस बार उनके काम करने का अलग स्टाइल इस फिल्म में मिलेगा। वहीं मधुर से हर बार कुछ बिल्कुल नया और बॉलिवुड की मेन स्ट्रीम से हटकर देखने की चाह रखने वाले दर्शकों को शायद उनका यह बदला स्टाइल पसंद ना आए। हां , मधुर ने इस फिल्म के माध्यम से एक ऐसे सच को समाज के सामने रखा है जो बडे शहरों में बेहतर करियर और सिर्फ अपना मकसद निकालने की चाह रखने वालों का असली चेहरा पेश करता है
कहानी : नरेन आहूजा ( अजय देवगन ) का अपनी जर्नलिस्ट वाइफ रितुपर्णा दास गुप्ता से तलाक हो चुका है। अपने बड़े बंगले के लोन की किस्त चुकाने के लिए वह अपने साथ अभय सूरी ( इमरान हाशमी ) और मिलिंद केलकर ( ओमी वैद्य ) को पेइंग गेस्ट रखता है। शौकीन मिजाज और ' सोओ और सोने दो ' को जिंदगी की टैग लाइन मानने वाला अभय सूरी जिम ट्रेनर है। झटपट शादी डॉट कॉम में मैनेजर मिलिंद केलकर सच्चे प्यार और लाइफ पार्टनर की तलाश में है। इनकी जिंदगी का नजरिया एक दूसरे से अलग है।
38 साल के नरेन आहूजा को अपने ऑफिस में बतौर ट्रेनी जॉइन करने वाली 20 साल की जून पिंटो ( शहजान पदमसी ) से प्यार हो जाता है। वहीं , अमीर लड़कियों को अपना एटीएम कार्ड समझने वाले अभय की जिंदगी में मिस इंडिया रह चुकी अनुष्का ( टिस्का चोपड़ा ) की एंट्री होती है , जो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा उम्र के अरबपति बिजनेसमैन नारंग की सेकंड वाइफ है। अनुष्का के रूप में अभय को अपना नया एटीएम कॉर्ड मिल जाता है। वहीं शादी को दो आत्माओं का अटूट बंधन समझने वाले मिलिंद कालेकर की मुलाकात रेडियो जॉकी गुनगुन सरकार ( श्रद्धा दास ) से होती है। कोलकाता से मुंबई आकर रेडियो जॉकी बनी गुनगुन एक्ट्रेस बनना चाहती है। गुनगुन की नजर में प्यार का कोई मतलब नहीं और वह मिलिंद को अपने मतलब के लिए यूज करने लगती है। इस बीच अभय सूरी की मुलाकात निक्की नारंग ( श्रुति हासन ) से होती है , अरबपति नारंग की बेटी निक्की को देखते अभय उससे प्यार करने लगता है। इस कहानी में कॉमिडी की चाशनी मिलाकर मधुर ने इसे अलग मसाला फिल्मों से हटकर परोसा गया है
एक्टिंग : नरेन आहूजा के रोल में अजय देवगन इस बार फिर ' अतिथि तुम कब जाओगे ' जैसे लुक में नजर आए। इमरान हाशमी सिल्वर स्क्रीन पर अपनी सीरियल किसर की इमेज से कितना बचना चाहे लेकिन मेकर्स उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे। हमेशा की तरह इमरान ने इस बार भी शौकीन मिजाज आशिक के रोल को ठीकठाक निभाया। सच्चे आशिक और भावुक कवि की भूमिका में ओमी वैद्य प्रभावित करते है , इस बार भी उनका हिंदी बोलने का स्टाइल ' थ्री इडियट्स ' में उनके रोल की याद दिलाता है। श्रद्धा दास , श्रुति हासन , शहनाज पद्मसी तीनों में से गुनगुन के किरदार में श्रद्धा दास नंबर वन है।
डायरेक्शन : इस बार भले ही मधुर ने अपनी रिएलिस्टिक डायरेक्टर की इमेज को कुछ चेंज करने की कोशिश की है। इस बार मधुर ने अपनी बात को कहने का अंदाज पिछली फिल्मों की तुलना में अलग चुना है। यह फिल्म उनकी गंभीर इमेज को बदलने में कुछ हद तक कामयाब होगी।
संगीत : प्रीतम का संगीत फिल्म का सशक्त पक्ष है , पिछले कुछ अर्से से हर दूसरी - तीसरी फिल्म में संगीत दे रहे बिजी प्रीतम ने इस बार कुछ नया और दिल को छूता संगीत दिया है। फिल्म की रिलीज से पहले फिल्म के तीन गाने ' अभी कुछ दिनों से , और ये दिल है नखरे वाला और तेरे बिन , जिया ... यंगस्टर्स की जुबां पर है।
क्यों देखे : अगर आप मधुर के फैंस है , तो इस फिल्म को देखिए। इस बार उनके काम करने का अलग स्टाइल इस फिल्म में मिलेगा। वहीं मधुर से हर बार कुछ बिल्कुल नया और बॉलिवुड की मेन स्ट्रीम से हटकर देखने की चाह रखने वाले दर्शकों को शायद उनका यह बदला स्टाइल पसंद ना आए। हां , मधुर ने इस फिल्म के माध्यम से एक ऐसे सच को समाज के सामने रखा है जो बडे शहरों में बेहतर करियर और सिर्फ अपना मकसद निकालने की चाह रखने वालों का असली चेहरा पेश करता है
Hostal Moove Review
राम गोपाल वर्मा कैंप के साथ बतौर स्क्रिप्ट राइटर जुडे़ रहे मनीष गुप्ता के नाम ' सरकार ' जैसी बेहतरीन फिल्म है , लेकिन न जाने क्यों उन्होंने जब निर्देशक के तौर पर इस फिल्म को बनाया तो स्क्रिप्ट से ज्यादा जोर बॉक्स ऑफिस पर बिकाऊ मसालों पर दिया। यही वजह है इस फिल्म में रैगिंग के नाम पर वही सब दिखाया जो आप अनुराग कश्यप की फिल्म ' गुलाल ' में पहले देख चुके हैं।
कहानी : शहर के प्रतिष्ठित इंजिनियरिंग कॉलेज में वत्सल सेठ ऐडमिशन लेता है। कॉलेज आने के बाद वत्सल का सामना कॉलेज के सीनियर स्टूडेंट्स के उस ग्रुप से होता है जो नए स्टूडेंट के साथ हर तरह की ज्याददती करना अपनी शान समझते हैं। कॉलेज में आने वाले नए स्टूडेंट से मनमानी रैगिंग करना और उसे मानसिक - शारीरिक तौर से प्रताडि़त करना इस ग्रुप का पहला काम है। इस ग्रुप के सभी सीनियर मेंबर्स का कॉलेज में इतना खौफ है कि कोई इनके सामने जुबां तक नहीं खोलता। ऐसे में इस ग्रुप का लीडर मुकेश तिवारी हर नए स्टूडेंट को शारीरिक तौर से भी शोषित करना अपनी शान समझता है। वत्सल के साथ जब यह गिरोह ऐसी रैगिंग करता है तो वह शांत बैठने की बजाय उनके खिलाफ बगावत करता है।
ऐक्टिंग : वत्सल सेठ और मुकेश तिवारी ने बस अपने रोल को निभा भर दिया है। वहीं ट्यूलिप जोशी को फिल्म में शोपीस बनाकर पेश किया गया।
डायरेक्शन : कॉलेज परिसर में डायरेक्टर ने ऐसा कुछ दिखाने की कोशिश की है जिस पर यकीन करना मुश्किल है। वहीं रैगिंग से जुड़ी इस कहानी में हिंसा को बेवजह ज्यादा दिखाने की कोशिश की। ऐसे में स्क्रिप्ट से हटकर चालू मसालों को फिल्म में परोसने में डायरेक्टर भटक गए।
क्यों देखें : अगर रैगिंग का एक और घिनौना चेहरा देखना चाहते हैं तो बस इसी मकसद के लिए फिल्म देख सकते हैं। वरना फिल्म में ऐसा कुछ भी नया नहीं जिसे देखने के लिए आप वक्त और पैसा खर्च करें। फैमिली क्लास से फिल्म का कुछ लेना देना नहीं।
कहानी : शहर के प्रतिष्ठित इंजिनियरिंग कॉलेज में वत्सल सेठ ऐडमिशन लेता है। कॉलेज आने के बाद वत्सल का सामना कॉलेज के सीनियर स्टूडेंट्स के उस ग्रुप से होता है जो नए स्टूडेंट के साथ हर तरह की ज्याददती करना अपनी शान समझते हैं। कॉलेज में आने वाले नए स्टूडेंट से मनमानी रैगिंग करना और उसे मानसिक - शारीरिक तौर से प्रताडि़त करना इस ग्रुप का पहला काम है। इस ग्रुप के सभी सीनियर मेंबर्स का कॉलेज में इतना खौफ है कि कोई इनके सामने जुबां तक नहीं खोलता। ऐसे में इस ग्रुप का लीडर मुकेश तिवारी हर नए स्टूडेंट को शारीरिक तौर से भी शोषित करना अपनी शान समझता है। वत्सल के साथ जब यह गिरोह ऐसी रैगिंग करता है तो वह शांत बैठने की बजाय उनके खिलाफ बगावत करता है।
ऐक्टिंग : वत्सल सेठ और मुकेश तिवारी ने बस अपने रोल को निभा भर दिया है। वहीं ट्यूलिप जोशी को फिल्म में शोपीस बनाकर पेश किया गया।
डायरेक्शन : कॉलेज परिसर में डायरेक्टर ने ऐसा कुछ दिखाने की कोशिश की है जिस पर यकीन करना मुश्किल है। वहीं रैगिंग से जुड़ी इस कहानी में हिंसा को बेवजह ज्यादा दिखाने की कोशिश की। ऐसे में स्क्रिप्ट से हटकर चालू मसालों को फिल्म में परोसने में डायरेक्टर भटक गए।
क्यों देखें : अगर रैगिंग का एक और घिनौना चेहरा देखना चाहते हैं तो बस इसी मकसद के लिए फिल्म देख सकते हैं। वरना फिल्म में ऐसा कुछ भी नया नहीं जिसे देखने के लिए आप वक्त और पैसा खर्च करें। फैमिली क्लास से फिल्म का कुछ लेना देना नहीं।
Dhobhi Ghat Moovie Review
बॉलिवुड सिनेमा में एक्सपेरिमेंट का दौर 70 के दशक में उस वक्त शुरू हुआ जब मृणाल सेन और श्याम बेनगल ने ऐसी फिल्में बनाने की पहल की जो एक खास क्लास की पसंद को ध्यान में रखकर बनाई गई। यकीनन , उस दौर में जब ऐक्शन , कॉमिडी और इंसानी भावनाओं पर फिल्में बना करती थीं , इन फिल्मों को बनाना और थिएटरों तक पहुंचाना आसान नहीं था। लेकिन उस दौर में भी भुवन सोम और अंकुर , निशांत जैसी फिल्मों को कुछ दर्शक मिले और बॉलिवुड में मसाला फिल्मों के साथ - साथ लीक से हटकर ऐसी फिल्में बनाने का दस्तूर भी शुरू हुआ जो किसी खास क्लास की कसौटी पर फिट बैठती।
मल्टिप्लेक्स कल्चर के बाद इन फिल्मों का अलग बाजार बन चुका है और अक्सर ऐसी फिल्में अपनी लागत निकालने के बाद मुनाफा भी कमाती हैं। आमिर खान प्रॉडक्शन की यह फिल्म इसी श्रेणी की फिल्म है , जिसमें कहानी और उसके किरदारों को बिना किसी भूमिका के उनके अपने अलग अंदाज में दिखाने की ईमानदार कोशिश की गई है। यकीनन इन फिल्मों का बाजार बेहद सीमित होता है और ऐसी फिल्में समांतर सिनेमा या कुछ नया देखने वालों की चाह रखने वाले दर्शकों की क्लास पर खरी उतरती हैं।
बतौर डायरेक्टर किरण राव ने भी अपनी पहली फिल्म के लिए ऐसा ही सब्जेक्ट चुना जिस पर आमिर खान भी फिल्म बनाने से पहले कई बार सोचते , लेकिन किरण ने अपनी बात को पूरी ईमानदारी के साथ कहने के मकसद से अपनी इस फिल्म को बॉलिवुड की मसाला , बॉक्स ऑफिस की कसौटी पर खरी उतरने वाली फिल्मों से इस कदर दूर रखा कि फिल्म एक खास क्लास के दर्शकों की बनकर रह गई है। अपने करियर की शुरुआत में किरण जब मुंबई आईं तो किराए के कई अपार्टमेंट में रहीं और इस फिल्म को देखकर लगता है अपनी उन यादों को समेटा और इस फिल्म में पेश करने की कोशिश की।
कहानी : फिल्म चार किरदारों के इर्दगिर्द घूमती है। इन किरदारों को आपस में कोई ऐसा रिश्ता नहीं जो इन्हें नजदीक लाता हो। हां इन किरदारों में ऐसा रिश्ता जरूर बनता है जो जाने अनजाने इन सभी को कहीं ना कहीं बांधता है। यास्मिन ( कीर्ति मल्होत्रा ) यूपी की हैं और निकाह के बाद अब मुंबई में अपने पति के साथ आकर बस चकी हैं। अरुण ( आमिर खान ) कल्पनाओं की दुनिया को अपने कैनवास में उतारने वाला ऐसा पेंटर जो अकेले में रहने का आदी हो चुका है। मुंबई जैसे बड़े शहर में उसे अकेला रहना इस कदर पसंद है कि कुछ अर्से बाद अपना आशियाना बदलता रहता है। साई ( मोनिका डोगरा ) बैंक इंडस्ट्री से ताल्लुक रखती है और उसे फोटोग्राफी का शौक नहीं बल्कि जुनून है। मुन्ना धोबी ( प्रतीक बब्बर ) जो बिहार से आठ साल की उम्र में अपने चाचा के यहां आया और यहीं का होकर रह गया।
मुन्ना की अपनी दुनिया है और उसका सपना सलमान खान की तरह बॉडी बनाकर ऐक्टर बनना है। इन चारों किरदारों को हालात कुछ ऐसे ढंग से मिलाते हैं सभी का एक दूसरे से कोई ना जाने - अनजाने रिश्ता बन जाता है। अरुण की एक पेटिंग प्रदर्शनी में साई से मुलाकात होती है और पहली मुलाकात के बाद दोनों एकसाथ रात गुजारते हैं। सुबह होते ही अरुण फिर कभी ना मिलने की बात कहकर उससे अलग हो जाता है। मुन्ना हर रोज साई के घर कपड़े देने - लेने आता है और यहीं उसे पता लगता है कि साई फोटोग्राफी करती है तो वह उससे अपना पोर्टफोलियो बनाने की बात करता है। साई उसका पोर्टफोलियो बनाती है और धोबी घाट पर जाकर भी उसकी फोटोग्राफी करती है। जहां , साई मुन्ना को अपना दोस्त समझती है , वहीं मुन्ना उससे प्यार करने लगता है। कहानी का अहम रहस्यमयी किरदार है यास्मिन जो अपार्टमेंट में रहने आए अरुण की जिंदगी को झकझोर कर रख देती है।
ऐक्टिंग : मोनिका डोगरा और कीर्ति मल्होत्रा ने पहली फिल्म में अपनी भूमिकाओं को जीवंत कर दिखाया है। यास्मिन की भूमिका में कीर्ति मल्होत्रा यकीनन मोनिका डोगरा से काफी आगे हैं। मुन्ना धोबी के रोल में प्रतीक बब्बर ने अपनी प्रतिभा साबित की। वहीं आमिर खान फिल्म में शुरू से आखिर तक एक अलग ट्रैक पर हैं और उन्होंने पेंटर अरुण के किरदार को बिल्कुल अलग अंदाज में जिया है।
डायरेक्शन : बतौर डायरेक्टर किरण ने अपनी पहली फिल्म के लिए ऐसा सब्जेक्ट चुना जिसमें उन्हें अपनी प्रतिभा को दिखाने का पूरा मौका मिले। मुंबई शहर को कहानी का अहम किरदार बनाना , यहां की तेज बारिश , रेलवे ट्रैक के साथ जीती जिंदगी के बीच इस शहर में रहने वालों की अपनी बेबसी और अकेलापन इस फिल्म में काफी सटीक ढंग से दिखाया गया है। कहानी की डिमांड के चलते कोई ऐसा मसाला फिट नहीं किया जो फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर टिकाने का दम रखता हो।
क्यों देंखे : अगर कुछ नया देखना चाहते है या समांतर और लीक से हटकर बनी फिल्मों के शौकीन हैं तो यकीनन फिल्म आपको पसंद आएगी। वहीं पहली फिल्म में कीर्ति मल्होत्रा की जानदार ऐक्टिंग के अलावा मुंबई शहर का ऐसा चेहरा जो आपने बॉलिवुड मसाला फिल्मों में नजर नहीं आता इस फिल्म में है। हां , वहीं वीकएंड पर एंटरटेनमेंट और फैमिली के साथ एन्जॉय की चाह में थिएटर का रुख करने वालों के लिए इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं जो उनकी पसंद पर खरा उतर सके। यकीनन इस क्लास को फिल्म सौ फीसदी निराश करेगी।
मल्टिप्लेक्स कल्चर के बाद इन फिल्मों का अलग बाजार बन चुका है और अक्सर ऐसी फिल्में अपनी लागत निकालने के बाद मुनाफा भी कमाती हैं। आमिर खान प्रॉडक्शन की यह फिल्म इसी श्रेणी की फिल्म है , जिसमें कहानी और उसके किरदारों को बिना किसी भूमिका के उनके अपने अलग अंदाज में दिखाने की ईमानदार कोशिश की गई है। यकीनन इन फिल्मों का बाजार बेहद सीमित होता है और ऐसी फिल्में समांतर सिनेमा या कुछ नया देखने वालों की चाह रखने वाले दर्शकों की क्लास पर खरी उतरती हैं।
बतौर डायरेक्टर किरण राव ने भी अपनी पहली फिल्म के लिए ऐसा ही सब्जेक्ट चुना जिस पर आमिर खान भी फिल्म बनाने से पहले कई बार सोचते , लेकिन किरण ने अपनी बात को पूरी ईमानदारी के साथ कहने के मकसद से अपनी इस फिल्म को बॉलिवुड की मसाला , बॉक्स ऑफिस की कसौटी पर खरी उतरने वाली फिल्मों से इस कदर दूर रखा कि फिल्म एक खास क्लास के दर्शकों की बनकर रह गई है। अपने करियर की शुरुआत में किरण जब मुंबई आईं तो किराए के कई अपार्टमेंट में रहीं और इस फिल्म को देखकर लगता है अपनी उन यादों को समेटा और इस फिल्म में पेश करने की कोशिश की।
कहानी : फिल्म चार किरदारों के इर्दगिर्द घूमती है। इन किरदारों को आपस में कोई ऐसा रिश्ता नहीं जो इन्हें नजदीक लाता हो। हां इन किरदारों में ऐसा रिश्ता जरूर बनता है जो जाने अनजाने इन सभी को कहीं ना कहीं बांधता है। यास्मिन ( कीर्ति मल्होत्रा ) यूपी की हैं और निकाह के बाद अब मुंबई में अपने पति के साथ आकर बस चकी हैं। अरुण ( आमिर खान ) कल्पनाओं की दुनिया को अपने कैनवास में उतारने वाला ऐसा पेंटर जो अकेले में रहने का आदी हो चुका है। मुंबई जैसे बड़े शहर में उसे अकेला रहना इस कदर पसंद है कि कुछ अर्से बाद अपना आशियाना बदलता रहता है। साई ( मोनिका डोगरा ) बैंक इंडस्ट्री से ताल्लुक रखती है और उसे फोटोग्राफी का शौक नहीं बल्कि जुनून है। मुन्ना धोबी ( प्रतीक बब्बर ) जो बिहार से आठ साल की उम्र में अपने चाचा के यहां आया और यहीं का होकर रह गया।
मुन्ना की अपनी दुनिया है और उसका सपना सलमान खान की तरह बॉडी बनाकर ऐक्टर बनना है। इन चारों किरदारों को हालात कुछ ऐसे ढंग से मिलाते हैं सभी का एक दूसरे से कोई ना जाने - अनजाने रिश्ता बन जाता है। अरुण की एक पेटिंग प्रदर्शनी में साई से मुलाकात होती है और पहली मुलाकात के बाद दोनों एकसाथ रात गुजारते हैं। सुबह होते ही अरुण फिर कभी ना मिलने की बात कहकर उससे अलग हो जाता है। मुन्ना हर रोज साई के घर कपड़े देने - लेने आता है और यहीं उसे पता लगता है कि साई फोटोग्राफी करती है तो वह उससे अपना पोर्टफोलियो बनाने की बात करता है। साई उसका पोर्टफोलियो बनाती है और धोबी घाट पर जाकर भी उसकी फोटोग्राफी करती है। जहां , साई मुन्ना को अपना दोस्त समझती है , वहीं मुन्ना उससे प्यार करने लगता है। कहानी का अहम रहस्यमयी किरदार है यास्मिन जो अपार्टमेंट में रहने आए अरुण की जिंदगी को झकझोर कर रख देती है।
ऐक्टिंग : मोनिका डोगरा और कीर्ति मल्होत्रा ने पहली फिल्म में अपनी भूमिकाओं को जीवंत कर दिखाया है। यास्मिन की भूमिका में कीर्ति मल्होत्रा यकीनन मोनिका डोगरा से काफी आगे हैं। मुन्ना धोबी के रोल में प्रतीक बब्बर ने अपनी प्रतिभा साबित की। वहीं आमिर खान फिल्म में शुरू से आखिर तक एक अलग ट्रैक पर हैं और उन्होंने पेंटर अरुण के किरदार को बिल्कुल अलग अंदाज में जिया है।
डायरेक्शन : बतौर डायरेक्टर किरण ने अपनी पहली फिल्म के लिए ऐसा सब्जेक्ट चुना जिसमें उन्हें अपनी प्रतिभा को दिखाने का पूरा मौका मिले। मुंबई शहर को कहानी का अहम किरदार बनाना , यहां की तेज बारिश , रेलवे ट्रैक के साथ जीती जिंदगी के बीच इस शहर में रहने वालों की अपनी बेबसी और अकेलापन इस फिल्म में काफी सटीक ढंग से दिखाया गया है। कहानी की डिमांड के चलते कोई ऐसा मसाला फिट नहीं किया जो फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर टिकाने का दम रखता हो।
क्यों देंखे : अगर कुछ नया देखना चाहते है या समांतर और लीक से हटकर बनी फिल्मों के शौकीन हैं तो यकीनन फिल्म आपको पसंद आएगी। वहीं पहली फिल्म में कीर्ति मल्होत्रा की जानदार ऐक्टिंग के अलावा मुंबई शहर का ऐसा चेहरा जो आपने बॉलिवुड मसाला फिल्मों में नजर नहीं आता इस फिल्म में है। हां , वहीं वीकएंड पर एंटरटेनमेंट और फैमिली के साथ एन्जॉय की चाह में थिएटर का रुख करने वालों के लिए इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं जो उनकी पसंद पर खरा उतर सके। यकीनन इस क्लास को फिल्म सौ फीसदी निराश करेगी।
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