Friday, February 4, 2011

Hostal Moove Review

राम गोपाल वर्मा कैंप के साथ बतौर स्क्रिप्ट राइटर जुडे़ रहे मनीष गुप्ता के नाम ' सरकार ' जैसी बेहतरीन फिल्म है , लेकिन न जाने क्यों उन्होंने जब निर्देशक के तौर पर इस फिल्म को बनाया तो स्क्रिप्ट से ज्यादा जोर बॉक्स ऑफिस पर बिकाऊ मसालों पर दिया। यही वजह है इस फिल्म में रैगिंग के नाम पर वही सब दिखाया जो आप अनुराग कश्यप की फिल्म ' गुलाल ' में पहले देख चुके हैं।

कहानी : शहर के प्रतिष्ठित इंजिनियरिंग कॉलेज में वत्सल सेठ ऐडमिशन लेता है। कॉलेज आने के बाद वत्सल का सामना कॉलेज के सीनियर स्टूडेंट्स के उस ग्रुप से होता है जो नए स्टूडेंट के साथ हर तरह की ज्याददती करना अपनी शान समझते हैं। कॉलेज में आने वाले नए स्टूडेंट से मनमानी रैगिंग करना और उसे मानसिक - शारीरिक तौर से प्रताडि़त करना इस ग्रुप का पहला काम है। इस ग्रुप के सभी सीनियर मेंबर्स का कॉलेज में इतना खौफ है कि कोई इनके सामने जुबां तक नहीं खोलता। ऐसे में इस ग्रुप का लीडर मुकेश तिवारी हर नए स्टूडेंट को शारीरिक तौर से भी शोषित करना अपनी शान समझता है। वत्सल के साथ जब यह गिरोह ऐसी रैगिंग करता है तो वह शांत बैठने की बजाय उनके खिलाफ बगावत करता है।

ऐक्टिंग : वत्सल सेठ और मुकेश तिवारी ने बस अपने रोल को निभा भर दिया है। वहीं ट्यूलिप जोशी को फिल्म में शोपीस बनाकर पेश किया गया।

डायरेक्शन : कॉलेज परिसर में डायरेक्टर ने ऐसा कुछ दिखाने की कोशिश की है जिस पर यकीन करना मुश्किल है। वहीं रैगिंग से जुड़ी इस कहानी में हिंसा को बेवजह ज्यादा दिखाने की कोशिश की। ऐसे में स्क्रिप्ट से हटकर चालू मसालों को फिल्म में परोसने में डायरेक्टर भटक गए।

क्यों देखें : अगर रैगिंग का एक और घिनौना चेहरा देखना चाहते हैं तो बस इसी मकसद के लिए फिल्म देख सकते हैं। वरना फिल्म में ऐसा कुछ भी नया नहीं जिसे देखने के लिए आप वक्त और पैसा खर्च करें। फैमिली क्लास से फिल्म का कुछ लेना देना नहीं।

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